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दर्द

बहोत हो चूका ऐ जिंदगी,अब संभल जा,
मौतके बहाने न जिलायेगी जबरदस्ती तुं मुझे.

બસ ઘણૂ થયું એ જિંદગી, સંભલી જા,
મૃત્યુના બહાનાથી જબરદસ્તીથી ન જીવાડીશ.

ख्वाबे-फरामोश जिंदगीसे क्या शिकवा?
जी गई जब पूरी उम्र पुख्ता यकीं ऐ वादोपे.

મૃગજળ જેવી જિંદગીથી શું ફરિયાદ?
જ્યારે આખી જિંદગી જીવી ગઈ વિશ્વાસ પર.

किस्मते इश्क न पूछो ‘नजु’का,
सर फोडते रहे उम्रभर संगके साथ.

નસીબ પ્રેમના ના પૂછો નજુ’થી,
જિંદગીભર માથું પછાડતી રહી પથ્થરથી.

कभी तो देखाकर तेरा पल्लु महाजन,
बेईमानी भरी है तेरे जीवनसे ज्यादा.

પંડિત ક્યારેક તો તારો પાલવ જો,
બેઇમાની ભરી છે જિંદગીથી પણ વધારે.

रेह गया मलाल जिंदगीभर मुझे,
दिल लगा भी तो एक बेदाद महाजनसे.

જિંદગીભર  માટે આ દુખ રહ્યુ મને,
દિલ લગાવ્યું તો પણ એક બેદાદ પંડિતથી.

બેદાદ=ફરિયાદ ન સાંભળનાર

नजमा मरचंट

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जिंदगी

आग लगे ऐसी जिंदगीको,
मोहताज हो गैरोकी सांसोपे.

આગ લાગે એવી જિંદગીને,
જે  બીજાનાં શ્વાસો પર અવલંબે

अब न गुमान है खुदाको,
अपनी बनाई हुई दुनिया पर.

હવે ખુદાને પણ અભિમાન નથી,
પોતાની બનાવેલી દુનિયા ઉપર.

अच्छा है कसम खानेपर सच्ची नहीं पडती,
कितनी शर्म उठानी पडती उसे वादे वफाकी बातपे.

સારૂ છે સોગંધ ખાવાથી સાચી પડતી નથી,
કેટલી શરમ આવતી એમને વફાદારીના વચન પર.

कसमसे उनके प्यारके सिवा कुछ नही ‘नजु’के दिलमें,
क्युं चूर चूर नहीं होता सिनेसे निकलकर.

સોગંધથી એમના પ્રેમ સિવાય કાંઇ નથી ‘નજુ’ના દિલમાં,
શા માટે ચૂર ચૂર થઈને કલેજામાંથી નીકળી નથી જતો.

कभी यह भी केह सकी होती जिंदगीको मैं,
दो रोजके इन्तेजारमे कोई वादा कैसे पूरा करे?

ક્યારેક આ  પણ કહી શકી હોત જિંદગીને હું,
બે દિવસની પ્રતિક્ષામાં કોઈ વાયદો કેવી રીતે પુરો કરે?

नजमा मरचंट

तन्हाईया

जन्नत क्या है?कौन गया लहदमें चक्कर लगाने?
मिली है जिंदगी तो मनसे क्युं न जी लु मैं?

नब्झ साकित नजर खामोश और मौत सामने थी,
पशेंमा जिंदगीको दो लब्झ तक न केह सकी मुआफीके.

बहोत सोचके इल्तीझा कि जिंदगीने मौतसे,
उनको न ले जाना,उनके बगैर न जी सकुगी मै.

कभी जिदंगी थी कभी दुनिया थी उनकी मैं,
लोग कहां जाते होंगे दुनिया ए जिंदगी छोडकर?

होंशमे आये तो होंश उड जाय देखके,
अच्छा है इनसान बेखुदीमे दुनिया देख.

लहद=कबर ,साकित=धीमी,बेखुदी=नशा

नजमा मरचंट

दर्दे-दिल

राह्ते जां कहा हिज्रके मारोको,
अभी दिलको समझाया तो आंखे रोने लगी.

करते है मझाक लोग चांद तारोका भी,
मै तो एक नुकता हूं जिसे लोग दुनिया कहते है.

अल्लाह इन्सानकी जिदकी भी हद होनी चाहिये,
एक लब्झ तक न बोले,सी लिया कफनमे मुझे.

कबतक लोग युं अफसानोसे भागते रहेंगे,
मौत आई बेवक्त तो जिंदगी रेह गई फसाना बनकर.

चारागर नहीं बतायेगा ईलाज मेरा,
तूम क्यु नझर फेर कर घडी देखते हो?

हिज्र= वियोग,नुकता =तारा,लब्झ=शब्द,चारागर=डोकटर

नजमा मरचंट

दर्दे-दिल

गुफ्तगु-ए इश्क है शायरी,
कभी रुठ्नेको तो कभी मनानेको जी चाहता है

आयेंगे खुदा हशरमे नाकामके वास्ते,
तूम क्या उठाओगे?फरिश्ते उठायेंगे नाझ हमारे.

ताकसे कोई उठाले मशाले इन्तेझार,
आती है शर्म अब शम्सको ढ्लती जवानी पर.

हिज्रसे थका दिल कहता है कभी कभी,
थोडा वस्ले सुकुन दे दो नजु,फिर कुछ नही मांगुगी.

साये इश्कने न छोडा दामने जूनु भी,
देर तक करती रही उनसे बाते मैं तन्हा.

नजमा मरचंट