ह्यात
अप्रैल 20, 2010 najmamerchant द्वारा

तजरुबा ए हयात नाकामसे ना पूछो,
और भी रंगीनीया है खल्कमे जीनेके लिये
.
જિંદગીનો અનુભવ નિષ્ફળ લોકોને ન પૂછો,
દુનિયામા બીજી ઘણી રંગીનીઓ છે
बदलती दुनियाके बदलते इन्सान ,
वफा भी गैरोको पूछके करते है
બદલતી દુનિયાના બદલતા માણસો,
વફા પણ બીજાને પૂછીને કરે છે
अब न हो परीशान तुं ए खुदा,
लोग खुब जानते है जीना अब.
એય ખુદા હવે તારે દુખી થવાની જરુર નથી,
લોકોને હવે જીવતા આવડી ગયુ છે.
अच्छा होता गर हिना न रंग लाती,
बारबार न खुने जीगर मलती अपने हाथोंमे.
સારુ થતે જો મહેંદીમા રંગ ન હોત,
વારમવાર હું જીગરનુ રક્ત હાથોમા ન લગાવતી
अबके वस्लमे तुम ही गले लगाना मुझे,
मेरे पांवमे ह्याकी बेडी है.
હવે મુલાકાત સમયે તુ જ મને ગળે લગાવજે,
મારા પગમા શરમની સાંકળ પડી છે.
अब न जमानेमे पेदा होंगे मजनु व फरहाद,
जान गंवाके लोग क्युं बेकार इश्क लडाये.
હવે દુનિયામા મજનુ અને ફરહાદ પેદા નહી થાય
પોતાનો જીવ ગુમાવીને બેકાર કોણ પ્રેમ કરે?
नजमा मरचंट
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तजरुबा ए हयात नाकामसे ना पूछो,
और भी रंगीनीया है खल्कमे जीनेके लिये
bahot khub aur zindagi ka sach bayan kiya hai is shair main…….God Bless
ईश्क़ में कभी ऎसा मक़ाम आते हॆं
जब इनसान केह देता हॆ
गुज़रे हॆं आज हम उस मक़ाम से
नफ़रत सी हिगई हॆ मोहब्बत के नाम से
कुछ ऎसे ही जज़बात का इज़हार नजमा ने अपनी शाइरी में किया हॆ
अब न जमानेमे पेदा होंगे मजनु व फरहाद,
जान गंवाके लोग क्युं बेकार इश्क लडाये.
बड़ी खूबसूरत गज़ल कही हॆ नजमा ने
बदलती दुनियाके बदलते इन्सान ,
वफा भी गैरोको पूछके करते है
बहोत ही खुब कहा है नजमा मरचन्ट्ने…आदमीको खुद्पे भरोसा नहि रहा हे…
अब न जमानेमे पेदा होंगे मजनु व फरहाद,
जान गंवाके लोग क्युं बेकार इश्क लडाये.
बहोत भारी बात कही है…अपने अनुभवसे आई हुई…
बारबार पढने को जी करता है वैसी तरोताजा लगती है ये गझल.
” बदलती दुनियाके बदलते इन्सान ,
वफा भी गैरोको पूछके करते है ”
” तजरुबा ए हयात नाकामसे ना पूछो ”
” अच्छा होता गर हिना न रंग लाती, ”
अछी कही